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लोमेश ऋषि ने क्या कहा ध्यान से पढ़िए |
लोमशसहिंता
का बारहवाँ अध्याय — धराचक्र
आचार्य रमन से कृष्णामूर्ति ज्योतिष सीखिये
यह धराचक्र नामक बारहवां अध्याय स्वन्त्र्तारूपसे भी प्रकाशित है, संक्षेपमे इसकी कुछ बाते दी जाती हैं|
इस अध्याय में 62 श्लोक हैं| मुख्यरूप से भूमि में स्थित दृव्य (धन), शल्य, जल और देवमूर्ति आदिके ज्ञानके उपाय बताये गए हैं|
सुत्जन्माने लोमशजी से पुछा — हे मुनिश्रेष्ठ! पृथ्वी के गर्भस्थित दृव्य (सुवर्ण—रजत आदि), शल्य (हड्डी आदि), जल और देवता—सम्बन्धी वस्तुओं को किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है; क्योंकि जिस दृव्य का कभी नाम नहीं सुना और न देखा, वह दृव्य कैसे प्राप्त हो सकता है, इसे बताने की कृपा करें|
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इस पर मुनि बोले — तुमने साधु प्रश्न किया है, इनका ज्ञान कैसे होगा, वह मैं बताता हूँ, ध्यानसे सुनो|
जिस स्थानपर गाने और बाजे की आवाज सुनाई दे तथा रात्रि के अंतिम प्रहर में अंधकार रहते हुए भी वहां प्रकाश—जैसा दिखाई पड़े, ऐसे स्थानों में जमीन के नीचे निश्चित ही धन का खजाना रहता है|
जिस स्थान पर नित्य सर्पोंका दर्शन हो, नकुल (नेवले) — का दर्शन या बिल हो, सरठ (बड़ा गिरगिट) प्रतिदिन दिखाई पड़े और सांयकाल तथा प्रात:काल जिस स्थान पर उत्तरमुख बैठा हुआ खंजरीट (खंजन) पक्षी दिखाई पड़े, उसे स्थानपर निश्चित दृव्य होता है — ‘तत्र स्यान्निश्चितं निधि:’ (लोo संo 12|6)|
ऐसे ही जिस स्थान पर लाल रंग का सर्प और लाल रंग की चींटी नित्य दिखाई पड़े, वहां निस्संदेह दृव्य रहता है — ‘तत्र दृव्यं न संशय:’ (लोo संo 12|7)|
आगे भी अनेक दृव्यस्थलों का निर्देश करने के अनंतर जल कहाँ होता है, इसे बताते हुए कहते हैं— जिस स्थान की चिकिनी मिटटी सुन्दर मीठे स्वादसे युक्त हो, जहाँ कांटेदार वृक्ष अधिक हो, चींटी आदि के अंडे प्रतिदिन दिखाई पड़ें या दूर्वा (दूब)—से पूर्ण भूमि हो, वहां निश्चय ही जल रहता है— ‘तत्र तोयं न संशय:’ (लोo संo 12|14)|
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देवता आदि कहाँ स्थित रहते हैं, इसके संबंधमे लोमशजी बताते हैं— जिस स्थान पर शयन करने से प्रतिदिन स्वप्न में देवताओं, ब्राह्मणों, अग्नि और गव्य—दूध—दही आदि दिखाई पड़े तथा जहाँ पर तुलसी का वृक्ष स्वयं उत्पन्न हो, निम्ब, अश्वत्थ आदि वृक्ष हों, उस स्थान पर निश्चित ही देवता रहते हैं— ऐसा समझना चाहिए—
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देवानां दर्शनं यत्र विप्राणां दर्शनं तथा|
यात्राग्निर्दृश्यते स्वप्ने गाव्यानं दर्शनं तथा||
तुलसी स्वयमुत्प्न्ना यत्र तत्र च भूतले|
निम्बाश्वत्थादिवृक्षाश्च तत्र देवो न संशय:|| (लोo संo 12|15—16)
भूमि में शल्य कहाँ गडा रहता है, इसको बताते हुए कहते हैं— जिस स्थान पर मिटटी ऊपर भूमि के समान हो और सियार आदि जन्तुओंसे युक्त हो, जहाँ के वृक्ष स्वयं सूख जाते हो, जिस स्थान पर तेल से भरा दीपक जलाने पर बार—बार बुझ जाते जाय, जहाँ पर रहने से चित्त में उद्वेग हो, अनेक प्रकार के प्राकृतिक उत्पात— उपद्रव होते हों, वहां निश्चय ही शल्य (हड्डी आदि) रहता है— ‘तत्र शल्यं न संशय:’ (लोo संo 12|19)|
तदनन्तर धराचक्र बनाने की विधि दी है और ग्रहों के द्वारा उस धराचक्र से दृव्य, शल्य, देवता तथा जल के ज्ञान के उपाय वर्णित हैं|
ये पदार्थ भूमि में कितने नीचे हैं, प्रयत्न करने पर प्राप्त होंगे या नहीं आदि बातों का भी वर्णन है| अंत में स्वप्नेश्वरीविद्या, स्वप्नेश्वरीचक्र तथा स्वप्नेश्वरीमंत्र का वर्णन है|
स्वप्नेशवरी की आराधना करके स्वप्नेशवरी यंत्र को सिरहाने रखकर सो जाय. स्वप्न में जैसा दिखाई पड़े, दृव्य आदि की प्राप्ति के लिए वैसा ही करना चाहिए|
‘ॐ ह्रीं श्रीं स्वप्नेश्वर्यै नमः’
यह स्वप्नेश्वरी का मन्त्र है|
इस प्रकार स्वप्नेश्वरी मन्त्र तथा यंत्र आदि की बातें बताकर लोमशजी ने सुत्जन्मा को बताया की यह ज्ञान अत्यंत गोप्य है, इसे श्रद्धालु शिष्य को ही देना चाहिए, अन्य को नहीं|
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यहीं पर बारहवाँ अध्याय पूर्ण हो जाता है| इस प्रकार लोमशजी ने ब्राह्मण सुत्जन्मा जो जातकस्कन्ध की बाते बतायीं|
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